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छत्तीसगढ़ के मरीजों को बड़ी राहत: अब निजी अस्पतालों से दवा खरीदना अनिवार्य नहीं, अस्पतालों को लगाना होगा सूचना बोर्ड...

छत्तीसगढ़ में निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों पर अपनी ही फार्मेसी से दवा खरीदने के दबाव को लेकर राज्य सरकार ने एक कड़ा और जनहितैषी निर्णय लिया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी नए निर्देशों के अनुसार, अब प्रदेश के किसी भी निजी अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीजों या उनके परिजनों को उसी अस्पताल के मेडिकल स्टोर से दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा। इस फैसले से लाखों मरीजों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वे अब अपनी सुविधा और बजट के अनुसार बाहर के मेडिकल स्टोर से दवाएं ले सकेंगे।

अक्सर देखा जाता था कि कई निजी अस्पताल डॉक्टर के पर्चे (Prescription) पर ऐसी कोडिंग या विशिष्ट ब्रांड लिखते थे जो केवल उनके ही स्टोर पर उपलब्ध होते थे, या मरीजों पर दबाव बनाया जाता था कि वे अस्पताल परिसर के बाहर से दवाएं न लाएं। सरकार के इस नए आदेश ने इस एकाधिकार को समाप्त कर दिया है। अब मरीज खुले बाजार से जेनेरिक या किफायती दरों पर मिलने वाली दवाएं खरीदने के लिए स्वतंत्र होंगे।
नए नियमों के तहत, सभी निजी अस्पतालों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे अपने परिसर और फार्मेसी काउंटर के पास एक स्पष्ट "सूचना बोर्ड" लगाएं। इस बोर्ड पर स्पष्ट रूप से हिंदी और अंग्रेजी में यह लिखा होना चाहिए कि "मरीज को अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा खरीदना अनिवार्य नहीं है।" यदि कोई अस्पताल ऐसा नहीं करता है या मरीजों पर दबाव बनाता है, तो उसके खिलाफ नर्सिंग होम एक्ट के तहत कड़ी दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी।
स्वास्थ्य विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि अस्पताल प्रबंधन मरीजों को बाहर से दवा लाने पर इलाज में लापरवाही या अन्य कोई बहाना नहीं बना सकते। प्रशासन का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता लाना और मरीजों के शोषण को रोकना है। विभाग ने आम जनता से भी अपील की है कि यदि कोई अस्पताल इस नियम का उल्लंघन करता है, तो वे तुरंत स्वास्थ्य विभाग के हेल्पलाइन नंबर या संबंधित जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMHO) से शिकायत करें।
इस ऐतिहासिक निर्णय का सामाजिक संगठनों और मरीज कल्याण समितियों ने स्वागत किया है। उनका मानना है कि कई बार अस्पताल के मेडिकल स्टोर पर दवाइयां एमआरपी (MRP) पर बेची जाती हैं, जबकि बाहर के स्टोर्स पर अक्सर भारी डिस्काउंट मिलता है। अब प्रतिस्पर्धा के कारण मरीजों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाएं मिल सकेंगी, जिससे इलाज के खर्च में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी आने की संभावना है।

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