Breaking
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना से अन्नू तिवारी को मिला मातृत्व का आर्थिक सहारा...
- Mahasamund News: करेले की उन्नत खेती ने बदली किसान नारायण प्रसाद वर्मा की तस्...
- 700 सहायक प्राध्यापकों की भर्ती और पदोन्नति प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब न कर...
- महिला कोष के ऋण से हरमनिया देवी की बदली जिंदगी, किराना-सिंगार दुकान बनी स्वाव...
- Raipur News: नोनी सुरक्षा योजना से कौशिल्या रजवाड़े की बेटी के भविष्य को मिला...
- Bilaspur News: हिंसा मामले में पुलिस का बड़ा एक्शन, सोहेल खान समेत 20 आरोपी ग...
- Dharamjaigarh News: जमीन फर्जीवाड़े में फरार तत्कालीन पटवारी गिरफ्तार, लैपटॉप...
- Chhattisgarh Textile News: तकनीकी वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने बनेगी व्यापक क...
- Korba News: जामबहार में 3.40 करोड़ से बनेगा नया बिजली सबस्टेशन, 4500 से अधिक ...
- Bastar News: कीचड़ और दुर्गम रास्तों के बीच नक्सल पीड़ित परिवारों तक पहुंचे ड...
6 महीने तक लिव-इन में रहने के बाद दुष्कर्म की शिकायत, हाईकोर्ट ने कहा — भरोसेमंद नही

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के बाद लगाया गया दुष्कर्म का आरोप भरोसेमंद नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस आधार पर निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 10 साल की सजा को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

मामला क्या है
यह मामला वर्ष 2015 का है। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी युवक ने उसका अपहरण कर जबरन शारीरिक संबंध बनाए।
पुलिस जांच में सामने आया कि दोनों करीब 6 महीने तक लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे। इस दौरान दोनों ने किराये के मकान में रहकर दांपत्य जैसा जीवन व्यतीत किया और युवती ने आरोपी के साथ विवाह करने के लिए हलफनामा (affidavit) भी दिया था।
ट्रायल कोर्ट का निर्णय
मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए 10 साल की कठोर सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट का तर्क
हाईकोर्ट ने कहा कि जब पीड़िता ने स्वेच्छा से आरोपी के साथ महीनों तक साथ रहकर संबंध बनाए, तो बाद में दुष्कर्म का आरोप विश्वसनीय नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में “सहमति और परिस्थितियों का स्पष्ट मूल्यांकन आवश्यक है, केवल आरोप के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।”
अदालत का अंतिम फैसला
अदालत ने कहा कि मामले में दुष्कर्म का ठोस प्रमाण नहीं मिला और ट्रायल कोर्ट का फैसला न्यायसंगत नहीं था।
इसलिए हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।







