छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के बाद लगाया गया दुष्कर्म का आरोप भरोसेमंद नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस आधार पर निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 10 साल की सजा को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
मामला क्या है
यह मामला वर्ष 2015 का है। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी युवक ने उसका अपहरण कर जबरन शारीरिक संबंध बनाए।
पुलिस जांच में सामने आया कि दोनों करीब 6 महीने तक लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे। इस दौरान दोनों ने किराये के मकान में रहकर दांपत्य जैसा जीवन व्यतीत किया और युवती ने आरोपी के साथ विवाह करने के लिए हलफनामा (affidavit) भी दिया था।
ट्रायल कोर्ट का निर्णय
मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए 10 साल की कठोर सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट का तर्क
हाईकोर्ट ने कहा कि जब पीड़िता ने स्वेच्छा से आरोपी के साथ महीनों तक साथ रहकर संबंध बनाए, तो बाद में दुष्कर्म का आरोप विश्वसनीय नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में “सहमति और परिस्थितियों का स्पष्ट मूल्यांकन आवश्यक है, केवल आरोप के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।”
अदालत का अंतिम फैसला
अदालत ने कहा कि मामले में दुष्कर्म का ठोस प्रमाण नहीं मिला और ट्रायल कोर्ट का फैसला न्यायसंगत नहीं था।
इसलिए हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।







_m.webp)
