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अंधेरे से रोशनी तक: नक्सलवाद छोड़ राजमिस्त्री बने अरविंद, आत्मसमर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति ने बदली जिंदगी

Chhattisgarh 06 April 2026 (49)

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रायपुर। हिंसा और आतंक के अंधेरे रास्तों को छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की कहानी अक्सर संघर्ष और साहस की मिसाल होती है। बीजापुर के 22 वर्षीय युवा अरविंद हेमला ने इसे सच कर दिखाया है। बचपन में ही माता-पिता को खोने और घोर आर्थिक तंगी झेलने वाले अरविंद गलत संगति और क्षेत्रीय परिस्थितियों के चलते नक्सली गतिविधियों की ओर मुड़ गए थे। लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हुआ कि यह रास्ता केवल विनाश की ओर जाता है। मार्च 2025 में शासन की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

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आत्मसमर्पण के बाद अरविंद को बीजापुर स्थित पुनर्वास केंद्र में न केवल सुरक्षा मिली, बल्कि उनके भविष्य को संवारने के लिए सही मार्गदर्शन और कौशल प्रशिक्षण भी दिया गया। उन्होंने वहां राजमिस्त्री (Civil Construction) का काम सीखा और अपनी तकनीकी दक्षता बढ़ाई। कभी हाथों में हथियार उठाने को मजबूर हुए अरविंद आज तेलंगाना के मंचेरियल जिले में निर्माण श्रमिक के रूप में काम कर रहे हैं। वे प्रतिदिन 600 रुपये की सम्मानजनक मजदूरी कमा रहे हैं और एक स्वतंत्र व शांतिपूर्ण जीवन जी रहे हैं।

अरविंद हेमला की यह कहानी राज्य सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति की सफलता का जीता-जागता उदाहरण है। यह संदेश देती है कि यदि व्यक्ति में दृढ़ इच्छाशक्ति हो और उसे सही सरकारी सहयोग मिले, तो वह किसी भी दलदल से निकलकर समाज की मुख्यधारा में सम्मान के साथ खड़ा हो सकता है। आज अरविंद न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि उन भटके हुए युवाओं के लिए एक प्रेरणा भी हैं जो हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास की राह पर चलना चाहते हैं।

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