छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था इस समय शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों के 50 हजार से ज्यादा पद रिक्त पड़े हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है, बल्कि प्रदेश के लाखों युवाओं के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा रही है। प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक, शिक्षकों के अभाव में कई संस्थान केवल 'अतिथियों' या वैकल्पिक व्यवस्था के भरोसे चल रहे हैं। प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में तो स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां कई स्कूल केवल एक ही शिक्षक के सहारे संचालित हो रहे हैं।
उच्च शिक्षा का बुरा हाल: 24 सालों से नहीं हुई प्रोफेसर की भर्ती
छत्तीसगढ़ राज्य गठन (साल 2000) के बाद से उच्च शिक्षा विभाग में एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। राज्य बनने के बाद से अब तक सरकारी कॉलेजों में प्रोफेसर (Professor) के पदों पर एक भी सीधी भर्ती नहीं की गई है। हालांकि सहायक प्राध्यापकों (Assistant Professors) की कुछ भर्तियां हुई हैं, लेकिन वरिष्ठ शैक्षणिक पदों का खाली होना शोध और उच्च स्तरीय शिक्षण के लिए बड़ी बाधा बना हुआ है। वर्तमान में जो प्रोफेसर कार्यरत हैं, वे ज्यादातर अविभाजित मध्य प्रदेश के समय के हैं और धीरे-धीरे सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जिससे कॉलेजों में शैक्षणिक शून्यता की स्थिति पैदा हो गई है।
प्रमोशन और सीधी भर्ती का पेच
शिक्षा विभाग में पदों के खाली होने का एक मुख्य कारण भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और कानूनी अड़चनें भी रही हैं। स्कूलों में व्याख्याता, शिक्षक और सहायक शिक्षकों के हजारों पद वर्षों से विज्ञापनों और अदालती कार्यवाहियों के बीच फंसे हुए हैं। इसके साथ ही, समय पर प्रमोशन न होने के कारण भी निचले स्तर के पद खाली नहीं हो पा रहे हैं और ऊपर के पदों पर योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं। छात्र संगठनों और बेरोजगार शिक्षक संघों ने कई बार बड़े आंदोलन किए हैं, लेकिन नियुक्तियों की सुस्त रफ्तार ने प्रदेश के शिक्षित युवाओं में हताशा पैदा कर दी है।
भविष्य की चुनौती: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने जल्द ही इन रिक्त पदों को भरने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो छत्तीसगढ़ के सरकारी शिक्षण संस्थानों से छात्रों का मोहभंग हो सकता है। "आत्मानंद स्कूलों" जैसे नवाचारों के बावजूद, बुनियादी ढांचे और स्थायी शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार पर अब यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वे चुनावी वादों के अनुरूप शिक्षा विभाग में 'बंपर भर्ती' की प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से शुरू करें, ताकि राज्य के युवाओं को रोजगार मिले और छात्रों को बेहतर गुरु।



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