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बंदूक छोड़ थामी सुई: दंतेवाड़ा में बदलाव की इबारत लिख रही पूर्व नक्सली शर्मिला, अब सिलाई से संवार रहीं भविष्य

Chhattisgarh 07 April 2026 (26)

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बस्तर की वादियों में अब हिंसा का शोर कम और स्वावलंबन की गूँज अधिक सुनाई दे रही है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभरी हैं बीजापुर की 19 वर्षीय शर्मिला पोयामी। कभी भैरमगढ़ एरिया कमेटी की सक्रिय सदस्य रहीं और गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण लेने वाली शर्मिला ने अब बंदूक छोड़कर हाथों में सुई-धागा थाम लिया है। दंतेवाड़ा के लाइवलीहुड कॉलेज में सिलाई का प्रशिक्षण ले रही शर्मिला की यह कहानी 'नए छत्तीसगढ़' के उस चेहरे को दर्शाती है, जो विकास और शांति की राह पर अग्रसर है।

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आत्मसमर्पण से आत्मनिर्भरता का सफर

7 फरवरी 2026 को आत्मसमर्पण करने वाली शर्मिला को अहसास हुआ कि प्रगति का मार्ग हिंसा से नहीं, बल्कि कौशल और शिक्षा से निकलता है। बीते 45 दिनों से वे सिलाई का गहन प्रशिक्षण ले रही हैं और सूट-ब्लाउज जैसे आधुनिक परिधान सिलने की बारीकियां सीख रही हैं। उनका सपना है कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वे अपने गांव लौटकर स्वयं का सिलाई केंद्र खोलें और अपनी 4 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर आधुनिक खेती कर परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती प्रदान करें।

बदला नजरिया और बेहतर सुविधाएं

शर्मिला ने बताया कि मुख्यधारा में लौटने के बाद उन्हें शासन की पुनर्वास नीति के तहत बेहतरीन सुविधाएं मिल रही हैं। कॉलेज में मिल रहे पौष्टिक आहार और सुरक्षित माहौल ने न केवल उनके स्वास्थ्य में सुधार किया है, बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ाया है। इसी आत्मविश्वास का परिणाम है कि उन्होंने हाल ही में जगदलपुर में आयोजित मैराथन दौड़ में भी हिस्सा लिया। शर्मिला की बहन मुड़ो पोयामी भी पूर्व नक्सल सदस्य रही हैं और अब वे भी मुख्यधारा में लौटकर आत्मनिर्भरता की राह पर हैं।

गांव के विकास की नई उम्मीद

शर्मिला अब केवल अपने भविष्य के लिए ही नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं के प्रति भी जागरूक हैं। वे चाहती हैं कि उनके गांव में पक्की सड़कें और शुद्ध पेयजल जैसी सुविधाएं पहुंचे। शर्मिला का यह संघर्षपूर्ण सफर उन सभी भटके हुए युवाओं के लिए एक नजीर है जो हिंसा का रास्ता छोड़कर सम्मानजनक जीवन जीना चाहते हैं। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति और शर्मिला जैसी बेटियों के दृढ़ संकल्प ने बस्तर में विकास की नई ज्योति जला दी है।

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