रायपुर: प्रशासनिक व्यवस्था में अमूमन किसी भू-स्वामी की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों के नाम जमीन ट्रांसफर करने यानी 'फौती नामांतरण' (Mutation) को एक बेहद पेचीदा और थका देने वाली प्रक्रिया माना जाता है। जानकारी के अभाव और लंबी कागजी औपचारिकता के चलते ग्रामीण इलाकों में ये मामले सालों-साल दफ्तरों और अदालतों में धूल खाते रहते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के जनजातीय बहुल और दुर्गम जिले बस्तर ने इस ढर्रे को पूरी तरह बदलते हुए सुशासन का एक ऐसा 'सक्रिय मॉडल' (Proactive Model) पेश किया है, जो पूरे देश के प्रशासनिक ढांचे के लिए एक नजीर बन गया है।
बस्तर जिला प्रशासन ने राजस्व विभाग के पारंपरिक 'रिएक्टिव' (फाइल आने पर काम करने) रवैये को दरकिनार कर 'प्रोएक्टिव' (जनता के द्वार खुद जाने) रुख अपनाया। इस विशेष अभियान के तहत मात्र चार महीनों के भीतर (12 जून 2026 तक संकलित आंकड़ों के अनुसार) जिले के 611 गांवों का डेटा जुटाकर लंबित फौती नामांतरण प्रकरणों का रिकॉर्ड स्तर पर शत-प्रतिशत निराकरण कर भूमि अभिलेखों (Land Records) को पूरी तरह अपडेट कर दिया गया है।
जमीनी स्तर पर काम आई 'त्रिमूर्ति' की जुगलबंदी
इस 'प्रोएक्टिव गवर्नेंस मॉडल' की सबसे बड़ी ताकत मैदानी अमले की वह 'त्रिमूर्ति' रही, जिसने फाइलों को दफ्तरों से निकालकर सीधे ग्रामीणों के घरों तक पहुंचा दिया। इस पूरे अभियान को एक पिरामिड की तरह चलाया गया, जिसके शीर्ष पर तहसीलदार और नायब तहसीलदार साप्ताहिक मॉनिटरिंग और विधिक आदेश पारित कर रहे थे।
ग्रासरूट पिरामिड और कार्य विभाजन
तहसीलों में सुशासन का 'सेचुरेशन': आंकड़ों की नजर से
जिले की सभी 10 तहसीलों में इस अभियान के तहत शानदार समन्वय देखने को मिला। मैदानी अमले द्वारा चिन्हित कुल 8,651 आवश्यक मामलों में से रिकॉर्ड 8,241 मामलों में विधिक प्रक्रिया (इश्तेहार प्रकाशन व दावा-आपत्ति निराकरण) पूर्ण कर अंतिम आदेश पारित किए जा चुके हैं। अब पूरे जिले में महज 410 प्रकरण ही लंबित बचे हैं।
तहसील चिन्हित मामले निराकृत मामले शेष (लंबित) मामले
तोकापाल 1,553 1,454 99
बकावण्ड 1,153 1,142 11
बस्तर 1,087 1,019 68
जगदलपुर 1,061 1,057 4
भानपुरी 1,018 959 59
लोहण्डीगुड़ा 805 799 6
करपावण्ड 565 504 61
नानगुर 544 518 26
दरभा 484 452 32
बास्तानार 381 337 44
बदलाव का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव: डिजिटल ट्रैकिंग (MD सीरिज) और स्वतः संज्ञान (Suo Motu) प्रक्रिया के कारण इस पूरी व्यवस्था से बिचौलियों का नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। भूमि रिकॉर्ड अपडेट होने से अब ये नए आदिवासी और ग्रामीण भू-स्वामी 'किसान क्रेडिट कार्ड' (KCC), कृषि सब्सिडी और अन्य धान खरीदी जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए तुरंत पात्र हो गए हैं।
पहले चरण (पिछले 4 वर्ष के लंबित मामले) की इस अभूतपूर्व सफलता के बाद, बस्तर जिला प्रशासन अब इसके आगामी और अधिक चुनौतीपूर्ण चरण की ओर कदम बढ़ा चुका है, जिसके तहत पिछले 10 वर्षों के लंबित मामलों का शत-प्रतिशत सेचुरेशन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।








