छत्तीसगढ़ में अवैध मतांतरण के बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य की विष्णु देव साय सरकार ने अब कानून को और अधिक सख्त बनाने की तैयारी कर ली है। सरकार आगामी विधानसभा के बजट सत्र में नया 'धर्म स्वतंत्रता विधेयक' (Freedom of Religion Bill) पेश करने जा रही है। इस नए कानून का मुख्य उद्देश्य प्रलोभन, दबाव या कपट के जरिए कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर पूरी तरह से रोक लगाना है।
पुराने कानून में बदलाव की आवश्यकता
राज्य में वर्तमान में लागू धर्मांतरण विरोधी नियमों को भाजपा सरकार अपर्याप्त मान रही है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा प्रावधानों में कई खामियाँ हैं, जिसका फायदा उठाकर मतांतरण कराने वाले गिरोह सक्रिय रहते हैं। नए विधेयक में इन कानूनी कमियों को दूर किया जाएगा और जांच प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी व त्वरित बनाया जाएगा, ताकि दोषियों को जल्द से जल्द सजा मिल सके।
कड़ी सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान
सूत्रों के अनुसार, नए विधेयक में अवैध मतांतरण के दोषियों के लिए जेल की अवधि और जुर्माने की राशि को बढ़ाया जा सकता है। विशेष रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और नाबालिगों के धर्मांतरण के मामलों में सजा के बेहद कड़े प्रावधान किए जा रहे हैं। इसमें सामूहिक धर्मांतरण कराने वाली संस्थाओं के खिलाफ भी कठोर दंडात्मक कार्रवाई और उनका पंजीकरण रद्द करने जैसे नियम शामिल हो सकते हैं।
कलेक्टर को देनी होगी पूर्व सूचना
विधेयक के प्रस्तावित मसौदे के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे एक निश्चित समय सीमा के भीतर जिला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) को पूर्व सूचना देनी होगी। इसके बाद जिला प्रशासन जांच करेगा कि यह परिवर्तन किसी दबाव या लालच में तो नहीं किया जा रहा है। सरकार का मानना है कि इस अनिवार्य प्रक्रिया से फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
साय सरकार के इस कदम से राज्य की सियासत गरमा गई है। जहाँ सत्ता पक्ष इसे प्रदेश की संस्कृति और आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठा सकता है। बजट सत्र के दौरान इस विधेयक पर सदन में तीखी बहस होने के आसार हैं। यह कानून भाजपा के प्रमुख चुनावी वादों में से एक रहा है, जिसे अब अमलीजामा पहनाया जा रहा है।







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