छत्तीसगढ़ सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के सबसे बड़े साधन 'मनरेगा' को हाईटेक बना दिया है। राज्य अब उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है जहाँ तकनीक के माध्यम से भ्रष्टाचार पर लगाम कसी गई है और मजदूरों के हक का पैसा सीधे उनके खातों तक पहुंच रहा है। e-KYC, जियो टैगिंग और QR कोड जैसे नवाचारों ने न केवल काम की गति बढ़ाई है, बल्कि फर्जीवाड़े की गुंजाइश को भी पूरी तरह खत्म कर दिया है।
पारदर्शिता के तीन मुख्य स्तंभ:
छत्तीसगढ़ की इस सफलता के पीछे तीन प्रमुख तकनीकी सुधार रहे हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर राज्य की रैंकिंग सुधार दी है:
आधार आधारित e-KYC: शत-प्रतिशत मजदूरों का e-KYC सुनिश्चित करने से 'घोस्ट वर्कर्स' (फर्जी मजदूर) का नाम हटा दिया गया है। अब केवल वास्तविक हितग्राहियों को ही काम और भुगतान मिल रहा है।
जियो टैगिंग (Geo-Tagging): मनरेगा के तहत होने वाले हर निर्माण कार्य (जैसे तालाब, डबरी, सड़क) की जियो टैगिंग अनिवार्य कर दी गई है। इससे काम की लोकेशन और प्रगति की रियल-टाइम मॉनिटरिंग दिल्ली और रायपुर से एक साथ संभव हो गई है।
QR कोड आधारित हाजिरी: मस्टरोल में हेराफेरी रोकने के लिए कई पंचायतों में QR कोड का उपयोग शुरू किया गया है, जिससे कार्यस्थल पर मजदूरों की उपस्थिति की सटीक जानकारी दर्ज होती है।
रोजगार सृजन में भी छत्तीसगढ़ अव्वल
सिर्फ पारदर्शिता ही नहीं, बल्कि काम देने के मामले में भी छत्तीसगढ़ ने नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। चालू वित्तीय वर्ष में राज्य ने निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक 'मानव दिवस' (Person Days) सृजित किए हैं। वनांचलों और दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में मनरेगा के माध्यम से लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया है। महिला सहभागिता के मामले में भी छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय औसत को पीछे छोड़ दिया है।
शासन की प्रतिबद्धता और भविष्य का लक्ष्य
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार, इन तकनीकी सुधारों से भुगतान में होने वाली देरी कम हुई है। अब ABPS (Aadhaar Based Payment System) के माध्यम से पैसा सीधे खातों में क्रेडिट हो रहा है। राज्य सरकार का अगला लक्ष्य मनरेगा को 'सस्टेनेबल आजीविका' से जोड़ना है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्ति का निर्माण होने के साथ-साथ मजदूरों की आय में भी स्थायी वृद्धि हो सके।








