छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिसने विभागीय कार्यप्रणाली और सरकारी धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्कूलों में आधार लिंकिंग की प्रक्रिया अनिवार्य किए जाने के बाद पहली से दसवीं कक्षा तक के छात्रों की संख्या में 10 लाख की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस आंकड़े ने न केवल शिक्षा व्यवस्था में 'फर्जी छात्रों' के नामांकन की संभावना को जन्म दिया है, बल्कि सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगाने का मामला भी उजागर किया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2021 से 2024 के बीच राज्य के स्कूलों में हर साल औसतन 51 से 53 लाख छात्रों को किताबें वितरित की गईं। हालांकि, आधार लिंकिंग के बाद सामने आए वास्तविक आंकड़ों (लगभग 45 लाख छात्र) से यह स्पष्ट होता है कि पिछले चार वर्षों में करीब 25 लाख अतिरिक्त छात्रों के लिए किताबें छापी गईं। यदि प्रति छात्र 250 रुपये का खर्च भी माना जाए, तो यह राशि 62.50 करोड़ रुपये तक पहुंचती है। जानकारों का कहना है कि यह गड़बड़ी केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यूनिफॉर्म और अन्य छात्रवृत्ति योजनाओं में भी इसी तरह का ट्रेंड देखने को मिल रहा है।
इस मामले के सामने आने के बाद विपक्ष और जागरूक नागरिकों ने शिक्षा विभाग की जवाबदेही तय करने की मांग की है। हालांकि प्रशासन अब आधार और यू-डाइस (UDISE) डेटा को दुरुस्त करने की बात कह रहा है, लेकिन सवाल यह है कि इतने वर्षों तक फर्जी नामांकन के आधार पर सरकारी फंड का दुरुपयोग कैसे होता रहा? फिलहाल, विभाग में इस बड़ी गड़बड़ी की जांच और भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति रोकने के लिए डेटा सत्यापन प्रक्रिया को और सख्त करने की तैयारी की जा रही है।







