रायपुर। धान के कटोरे के रूप में विख्यात छत्तीसगढ़ अब खाद्य तेल (Edible Oil) के क्षेत्र में भी अपनी एक नई और विशिष्ट पहचान बनाने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। राज्य सरकार की प्रभावी नीतियों और किसानों के उत्साह के चलते प्रदेश अब खाद्य तेल के उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है। तेलहन फसलों (Oilseeds) जैसे– सोयाबीन, सरसों, तिल, मूंगफली और सूरजमुखी के रकबे में बढ़ोतरी कर राज्य की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती देने की तैयारी है।
तिलहन फसलों के लिए विशेष प्रोत्साहन
राज्य सरकार द्वारा किसानों को पारंपरिक धान की खेती के साथ-साथ तिलहन फसलों को अपनाने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके लिए उन्नत बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और सब्सिडी जैसे लाभ प्रदान किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय का विजन है कि छत्तीसगढ़ की उपजाऊ धरा न केवल अन्न, बल्कि तेल उत्पादन में भी देश की मदद करे।
प्रोसेसिंग यूनिट्स और वैल्यू एडिशन
आत्मनिर्भरता की इस कड़ी में केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि प्रसंस्करण (Processing) पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। राज्य के विभिन्न जिलों में छोटे-बड़े ऑयल मिल्स और प्रोसेसिंग यूनिट्स की स्थापना को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन हो रहा है और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल रहा है।
खाद्य तेल मिशन के मुख्य बिंदु:
फसल विविधीकरण: धान के स्थान पर कम पानी वाली तिलहन फसलों की खेती को प्राथमिकता।
बोनस और एमएसपी: तिलहन फसलों के लिए लाभकारी मूल्य और सरकारी खरीद की पुख्ता व्यवस्था।
ऑयल पाम की खेती: बस्तर और अन्य उपयुक्त क्षेत्रों में ऑयल पाम की खेती का विस्तार कर आयात कम करने का लक्ष्य।
किसानों की आय में वृद्धि: कम लागत और अधिक मुनाफे वाली फसलों से ग्रामीणों के जीवन स्तर में सुधार।
छत्तीसगढ़ का यह प्रयास न केवल राज्य के लिए बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य तेलों के आयात को कम करने की दिशा में एक बड़ा योगदान साबित होगा। सरकार के इन कदमों से आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ "खाद्य तेल हब" के रूप में उभरने के लिए पूरी तरह तैयार है।








