लोक निर्माण विभाग और संबंधित निर्माण निकायों द्वारा कार्यप्रणाली में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। विभाग ने अलग-अलग होने वाले करीब 150 छोटे निर्माण कार्यों को आपस में मर्ज (Merge) कर एक ही निविदा (Single Tender) जारी करने का निर्णय लिया है। प्रशासन का तर्क है कि इस प्रक्रिया से कागजी कार्रवाई में लगने वाला समय बचेगा और बड़े स्तर पर काम होने से गुणवत्ता और निगरानी में सुधार होगा। हालांकि, इस फैसले ने स्थानीय और छोटे ठेकेदारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं, जो छोटे टेंडरों के भरोसे अपना व्यवसाय चलाते थे।
इस बड़े बदलाव के पीछे मुख्य उद्देश्य निर्माण प्रक्रिया में तेजी लाना और भ्रष्टाचार की गुंजाइश को कम करना बताया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, जब छोटे-छोटे काम अलग-अलग होते हैं, तो उनकी मॉनिटरिंग करना कठिन होता है और प्रोजेक्ट्स में देरी की संभावना अधिक रहती है। अब एक बड़ी एजेंसी को पूरी जिम्मेदारी मिलने से जवाबदेही तय करना आसान होगा। लेकिन तकनीकी रूप से, अब केवल वही कंपनियां इस निविदा में हिस्सा ले पाएंगी जिनके पास बड़ी टर्नओवर क्षमता और भारी मशीनरी उपलब्ध है।
दूसरी ओर, इस फैसले का व्यापक विरोध भी शुरू हो गया है। स्थानीय ठेकेदार संघ का कहना है कि 150 कार्यों को एक साथ जोड़ने से प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी और केवल कुछ चुनिंदा बड़े ठेकेदारों का ही एकाधिकार (Monopoly) स्थापित होगा। इससे छोटे और मध्यम स्तर के ठेकेदारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो सकता है। जानकारों का मानना है कि इस नीति से निविदा की राशि करोड़ों में पहुँच गई है, जिससे छोटे क्लास के ठेकेदार चाहकर भी इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पा रहे हैं।
फिलहाल, इस विवादित फैसले पर विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रालय स्तर पर चर्चा जारी है। यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले समय में अन्य जिलों और विभागों में भी इसी तरह की 'क्लबिंग' प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार छोटे ठेकेदारों के हितों की रक्षा के लिए इस निविदा की शर्तों में कोई ढील देती है या बड़े ठेकेदारों के माध्यम से ही इन 150 कार्यों को पूरा कराया जाएगा।








