गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र से एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। ग्राम भाठीगढ़ स्थित 'शासकीय आदिवासी बालक आश्रम बड़े गोबरा' में रहकर पढ़ाई करने वाले कक्षा 7वीं के छात्र राघव कुमार मंडावी की इलाज में बरती गई कथित लापरवाही के कारण मौत हो गई। राघव अपने माता-पिता की इकलौती संतान था। माता-पिता ने अपने भविष्य के सहारे को बड़े अरमानों के साथ आवासीय आश्रम भेजा था, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनका लाड़ला वहां से कभी जीवित वापस नहीं लौटेगा।
20 जनवरी से गुहार लगा रहा था मासूम
मिली जानकारी के अनुसार, छात्र राघव मंडावी पिछले 20 जनवरी से बीमार था। उसने कई बार आश्रम के कर्मचारियों और साथियों को अपनी तबीयत खराब होने की जानकारी दी थी। छात्र बार-बार गुहार लगा रहा था कि उसके माता-पिता से मोबाइल पर बात करा दी जाए, ताकि वह घर जा सके। लेकिन आरोप है कि आश्रम के कर्मचारियों ने मासूम की तकलीफ को अनसुना कर दिया और न ही उसके परिजनों को इसकी सूचना दी।
गणतंत्र दिवस पर पिता ने देखा तो उड़ गए होश
26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के दिन जब पिता फिरतु राम मंडावी अपने बेटे से मिलने आश्रम पहुँचे, तो वहां का नजारा देख उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। राघव बेहद कमजोर हालत में बिस्तर पर पड़ा था। पिता को देखते ही राघव ने अपनी व्यथा सुनाई कि वह कई दिनों से बीमार है और कोई उसकी सुध नहीं ले रहा है। पिता ने तत्काल छुट्टी का आवेदन दिया और उसे इलाज के लिए घर ले गए। बाद में हालत बिगड़ने पर उसे धमतरी के बठेना अस्पताल ले जाया गया, जहाँ शुक्रवार सुबह 4 बजे उसने दम तोड़ दिया।
मामले को दबाने और परिजनों पर दबाव का आरोप
छात्र की मौत के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने इस पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। सनसनीखेज आरोप लगाए जा रहे हैं कि आश्रम अधीक्षक और संबंधित विभाग के अधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए कागजी खानापूर्ति में जुट गए हैं। परिजनों पर बयान न देने का दबाव बनाया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि अधीक्षक खुद को रसूखदार बताकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, आदिवासी सहायक आयुक्त गरियाबंद, लोकेश्वर पटेल का कहना है कि उन्हें मामले की जानकारी अभी मिली है और जांच के बाद ही कुछ कह पाएंगे।
बदहाल सिस्टम पर उठते सवाल
इस घटना ने सरकारी आश्रमों और छात्रावासों की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। आश्रम अधीक्षक राकेश साहू ने अपनी सफाई में कहा कि 17 जनवरी को 'चिरायु दल' ने परीक्षण किया था, तब छात्र ठीक था। सवाल यह उठता है कि क्या 17 तारीख के बाद छात्र की सुध लेना प्रबंधन की जिम्मेदारी नहीं थी? एक आदिवासी छात्र की मौत ने फिर साबित कर दिया है कि जिम्मेदार अधिकारियों की संवेदनहीनता मासूमों की जान पर भारी पड़ रही है।







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