भारत ने अगले 5 वर्षों में अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर (लगभग 42 लाख करोड़ रुपये) के उत्पाद और सेवाएं खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। यह समझौता राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई गहन वार्ताओं का परिणाम है। इस डील के तहत अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले दंडात्मक शुल्क को घटाकर 18% कर दिया है, जिससे 'Made in India' सामान अमेरिकी बाजार में सस्ता होगा।
भारत आखिर कहां खर्च करेगा इतने पैसे?
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, भारत को अपनी $30 ट्रिलियन इकोनॉमी के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए इन आयातों की जरूरत है। मुख्य निवेश इन क्षेत्रों में होगा:
विमानन (Aviation): करीब $100 बिलियन (8.4 लाख करोड़ रुपये) केवल नागरिक उड्डयन क्षेत्र में बोइंग जैसे अमेरिकी विमानों की खरीद पर खर्च होंगे।
ऊर्जा (Energy): भारत अमेरिका से भारी मात्रा में कच्चा तेल, LNG और कोयला खरीदेगा ताकि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
रक्षा और तकनीक: आधुनिक हथियार, ग्राफ़िक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPUs) और डेटा सेंटर से जुड़ी हाई-एंड टेक्नोलॉजी की खरीद।
कीमती धातुएं: औद्योगिक और निवेश के उद्देश्य से सोने-चांदी और अन्य कीमती धातुओं का आयात।
अमेरिका की शर्तें: क्या है पेंच?
इस डील के पीछे अमेरिका ने कुछ कड़ी शर्तें भी रखी हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है:
रूसी तेल पर रोक: अमेरिका ने भारत से रूस से कच्चा तेल खरीदने की निर्भरता को पूरी तरह खत्म करने का आश्वासन माँगा है।
टैरिफ में कटौती: भारत को अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों, कृषि उत्पादों (जैसे बादाम, फल, सोया तेल) और मेडिकल डिवाइस पर आयात शुल्क को या तो खत्म करना होगा या काफी कम करना होगा।
बाजार पहुंच: अमेरिकी टेक कंपनियों और डेयरी उत्पादों (सीमित तौर पर) के लिए भारतीय बाजार को और अधिक खोलना।
भारत को क्या हासिल हुआ?
निर्यात को पंख: भारतीय टेक्सटाइल, लेदर, जेम्स एंड ज्वेलरी और फार्मा सेक्टर के लिए अमेरिका का विशाल बाजार अब ज्यादा सुलभ होगा।
30 ट्रिलियन डॉलर का अवसर: पीयूष गोयल के अनुसार, इस डील से भारतीय निर्यातकों के लिए $30 ट्रिलियन की अमेरिकी जीडीपी का द्वार खुल गया है, जिससे लाखों नए रोजगार पैदा होंगे।
मुद्रा और बाजार में स्थिरता: इस समझौते की खबर आते ही भारतीय शेयर बाजार और रुपये में मजबूती देखी गई है।








