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जल संरक्षण से संवरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था: मनरेगा की 'डबरी' बनी किसानों के लिए आय का नया जरिया

Chhattisgarh RRT News Desk 15 January 2026

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छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में जल संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयास अब रंग लाने लगे हैं। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत खेतों में बनाई जा रही 'डबरियों' ने न केवल गिरते भू-जल स्तर को थामने का काम किया है, बल्कि ग्रामीणों के लिए आजीविका के नए द्वार भी खोल दिए हैं। राज्य के कई जिलों में किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ डबरी के माध्यम से मत्स्य पालन और सब्जी उत्पादन कर अपनी आय में दो से तीन गुना वृद्धि कर रहे हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व में सिंचाई की सुविधा न होने के कारण ग्रामीण केवल एक ही फसल (मानसून पर आधारित) ले पाते थे। लेकिन मनरेगा डबरी योजना के तहत अब खेतों में सालों भर पानी उपलब्ध रहता है। इससे न केवल धान की फसल को जीवनदान मिला है, बल्कि किसान रबी के मौसम में भी दलहन-तिलहन और सब्जियों की खेती कर रहे हैं। डबरी निर्माण से मिट्टी की नमी बनी रहती है, जिससे आसपास के कुओं और बोरवेल का जल स्तर भी ऊपर उठा है।

डबरी का बहुउद्देशीय उपयोग अब ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य आधार बन गया है। जल भराव होने के बाद किसान इसमें मछली पालन कर रहे हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त नकद आय प्राप्त हो रही है। साथ ही, डबरी के मेढ़ों पर उन्नत किस्म की सब्जियों और फलदार पौधों का रोपण किया जा रहा है। शासन की इस योजना ने छोटे और सीमांत किसानों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है, जिससे पलायन की समस्या में भी कमी आई है।

राज्य सरकार के अनुसार, मनरेगा के माध्यम से डबरी निर्माण को प्राथमिकता दी जा रही है क्योंकि यह सीधे तौर पर ग्रामीण परिवेश के आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़ा है। विभिन्न ग्राम पंचायतों में हजारों की संख्या में डबरियों का निर्माण पूर्ण हो चुका है और कई प्रगति पर हैं। इन संरचनाओं ने न केवल पर्यावरण को लाभ पहुँचाया है, बल्कि पशुओं के लिए पेयजल की उपलब्धता भी सुनिश्चित की है, जिससे पशुपालन क्षेत्र को भी बढ़ावा मिल रहा है।

सफलता की ये कहानियाँ अब छत्तीसगढ़ के हर गांव से निकलकर सामने आ रही हैं, जहाँ किसान अपनी बंजर जमीन को डबरी के पानी से हरा-भरा कर रहे हैं। सिंचाई के इस किफायती और सुलभ साधन ने किसानों के आत्मविश्वास को बढ़ाया है। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले समय में हर खेत तक जल संरक्षण की इस तकनीक को पहुँचाया जाए ताकि राज्य का हर किसान 'अन्नदाता' के साथ-साथ 'उद्यमी' भी बन सके।

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