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रायपुर : चौपाटी निर्माण और हटाने की कहानी — आखिर किसका हुआ फायदा, किसका हुआ नुकसान?
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संपादक की कलम से…

रायपुर, हाल ही में रायपुर साइंस कॉलेज के समीप पूर्व सरकार द्वारा करोड़ों की लागत से बनाई गई चौपाटी को लेकर काफी विवाद हुआ। विरोध के चलते अंततः उसे हटाने का आदेश हुआ और चौपाटी हटा भी दी गई। लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण सवाल कहीं पीछे छूट गया — चौपाटी बनाने या हटाने से वास्तविक फायदा किसे हुआ और नुकसान किसका हुआ?
असल में इस निर्णय का सबसे बड़ा प्रभाव उन लोगों पर पड़ा जिनकी रोजी-रोटी इसी चौपाटी पर निर्भर थी।
वे छोटे व्यापारी जिनके परिवार इसी आय पर चलता था, जिनके बच्चे उसी से स्कूल जाते थे और परिवार की जरूरतें पूरी होती थीं — उनका पूरा कारोबार मानो “जिद या अहंकार” की भेंट चढ़ गया।
हम यह नहीं कहते कि चौपाटी बनाना सही था या उसे हटाना गलत।
लेकिन सवाल यह जरूर उठता है कि सरकार कोई भी हो, निर्णय सोच-समझकर और भविष्य को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए, क्योंकि खर्च किया गया पैसा किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि जनता द्वारा दिए गए टैक्स का होता है।
इसका दुरुपयोग न हो, यह सुनिश्चित करना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है, न कि बदले की भावना से कार्य करना।
इसी तरह नगर निगम और स्मार्ट सिटी के कई कार्यों में यही स्थिति देखी गई —
* पहले निर्माण करना,
* फिर उसे तोड़ देना,
* फिर दोबारा नए निर्माण में पैसा लगाना।
इसी क्रम में शहर के डिवाइडर में लगे सामान्य पोल हटाकर स्मार्ट पोल लगाए गए, और उन पर पोस्टर चस्पा कर उन्हें बदसूरत कर दिया गया।
इस तरह के निर्णयों से शहर स्मार्ट नहीं बन रहा, हाँ… अफसर जरूर स्मार्ट होते जा रहे हैं।
शासन की योजनाएँ चाहे महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों या युवाओं के लिए हों — उनका सही और पूर्ण क्रियान्वयन होना आवश्यक है।
क्योंकि ये योजनाएँ किसी पार्टी विशेष के लिए नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की जनता के लिए होती हैं।
इसमें राजनीति या बदले की भावना की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
यह संपादक के निजी विचार हैं।
संपादक :- राकेश तराटे


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