दशकों तक बस्तर के अबूझमाड़ और घने जंगलों में मौत का खेल खेलने वाले पूर्व शीर्ष माओवादी नेता भूपति के जीवन में इस बार की होली एक नई सुबह की तरह आई। बीजापुर के पुलिस पुनर्वास केंद्र में आयोजित इस विशेष होली मिलन समारोह में भूपति ने हथियारों को पीछे छोड़ हाथों में गुलाल थामा। जो हाथ कभी संगठन के लिए नीतियां बनाते और हमले की रणनीति तैयार करते थे, वे आज पुलिस अधिकारियों और अपने साथी आत्मसमर्पित माओवादियों के चेहरे पर स्नेह का रंग लगाते दिखे। यह नजारा छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में आ रहे बड़े बदलाव की गवाही दे रहा था।
भूपति के लिए यह अनुभव बेहद भावुक था। उसने बताया कि जंगल की 'जंग' में रंगों के लिए कोई जगह नहीं थी; वहाँ केवल धुआं, बारूद और अनिश्चितता का साया रहता था। लेकिन समाज की मुख्यधारा में लौटने के बाद, यह उसकी पहली ऐसी होली है जहाँ वह बिना किसी डर और छिपने की मजबूरी के खुलकर हंस सका है। भूपति के मुताबिक, "जंगल में हम केवल नफरत और वैचारिक लड़ाई में उलझे थे, लेकिन समाज के बीच रहकर पता चला कि जिंदगी के असली रंग तो खुशियों और शांति में बसे हैं।"
बीजापुर पुलिस की इस पहल का उद्देश्य आत्मसमर्पित नक्सलियों के मन से अलगाव की भावना को खत्म करना और उन्हें यह अहसास दिलाना है कि समाज उन्हें अपनाने के लिए तैयार है। जिला पुलिस बल और अधिकारियों के साथ मिलकर पूर्व माओवादियों ने फाग गीत गाए और ढोल-नगाड़ों की थाप पर जमकर नृत्य किया। प्रशासन का मानना है कि भूपति जैसे बड़े कैडर का इस तरह खुलकर उत्सव मनाना उन सक्रिय नक्सलियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो अब भी भ्रमित होकर जंगलों में भटक रहे हैं।
यह 'शांति की होली' बस्तर के बदलते सुरक्षा परिदृश्य का भी प्रतीक है। छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति और विकास की पहुंच ने अब बंदूक की धमक को कम करना शुरू कर दिया है। भूपति की यह मुस्कान उन हजारों आदिवासियों के लिए उम्मीद की किरण है जो शांतिपूर्ण जीवन की चाह रखते हैं। कार्यक्रम के समापन पर सभी ने बस्तर को 'लाल आतंक' से मुक्त कर 'खुशियों के रंगों' से भरने का सामूहिक संकल्प लिया।








