बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य के लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा किए गए मरम्मत और रखरखाव कार्यों में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी की आशंका जताई है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि बिना गुणवत्ता परीक्षण और पूर्ण भौतिक सत्यापन के करोड़ों रुपये का भुगतान नहीं किया जाएगा। माननीय न्यायालय ने इन सभी कार्यों की 100% (शत-प्रतिशत) जांच के आदेश जारी किए हैं, जिससे विभाग के आला अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच खलबली मच गई है।
क्या है पूरा मामला?
कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया गया था कि प्रदेश के विभिन्न सरकारी भवनों और सड़कों के मरम्मत कार्य के नाम पर कागजों में ही भारी-भरकम राशि खर्च दिखा दी गई है। याचिकाकर्ता ने सबूत पेश करते हुए बताया कि कई जगहों पर बिना काम किए ही करोड़ों के बिल पास कर दिए गए और गुणवत्ता के मानकों की पूरी तरह अनदेखी की गई।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश
चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से भी टिप्पणी की कि जनता की कमाई का पैसा इस तरह बर्बाद नहीं होने दिया जा सकता। कोर्ट ने निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए हैं:
भुगतान पर रोक: मरम्मत कार्यों से जुड़े सभी लंबित और विवादित भुगतानों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है।
शत-प्रतिशत जांच: विभाग को आदेश दिया गया है कि वह एक स्वतंत्र टीम के माध्यम से हर एक कार्य का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करे।
गुणवत्ता रिपोर्ट: जांच दल को यह सुनिश्चित करना होगा कि किया गया कार्य निर्धारित स्पेसिफिकेशन के अनुरूप है या नहीं।
जिम्मेदारी तय हो: यदि जांच में गड़बड़ी पाई जाती है, तो न केवल ठेकेदारों पर कार्रवाई होगी, बल्कि संबंधित इंजीनियरों और अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।
भ्रष्टाचार के खिलाफ 'ज़ीरो टॉलरेंस'
यह फैसला राज्य सरकार और उसके विभागों के लिए एक बड़ी चेतावनी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मरम्मत कार्यों में अक्सर 'मेंटेनेंस' के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये निकाले जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति नहीं बदलती। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद अब विभाग को एक-एक पैसे का हिसाब देना होगा।








