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जहां लगती थी माओवादियों की 'जन अदालत', अब वहां लोकतंत्र की दस्तक; खूंखार नक्सली पापाराव के गांव पहुंचे SP और कलेक्टर

Chhattisgarh RRT News Desk 15 March 2026

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सुकमा: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग से परिवर्तन की एक बड़ी तस्वीर सामने आई है। किसी समय खूंखार माओवादी कमांडर पापाराव का गढ़ माने जाने वाले इलाके में, जहां कभी नक्सलियों की डरावनी 'जन अदालत' लगती थी, अब वहां प्रशासन और लोकतंत्र की मौजूदगी दर्ज हो रही है। सुकमा जिले के अत्यंत संवेदनशील अंदरूनी क्षेत्र में स्थित पापाराव के पैतृक गांव में पहली बार जिले के SP और कलेक्टर ने पहुंचकर ग्रामीणों से सीधा संवाद किया। यह दौरा इस बात का प्रतीक है कि लाल आतंक के साये को पीछे छोड़कर अब ग्रामीण विकास की मुख्यधारा से जुड़ने को तैयार हैं।

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सुरक्षा बलों की बढ़ती पैठ और नए पुलिस कैंपों की स्थापना के बाद प्रशासन अब उन इलाकों तक भी पहुंच रहा है, जो दशकों से अभेद्य किला बने हुए थे। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने गांव में चौपाल लगाकर ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और उन्हें शासन की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी। ग्रामीणों ने भी बिना किसी भय के शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी बुनियादी जरूरतों की मांग रखी। अधिकारियों का यह दौरा न केवल सुरक्षा के प्रति विश्वास जगाने वाला रहा, बल्कि नक्सलियों के उस भ्रम को भी तोड़ने वाला था कि सरकार उन तक नहीं पहुंच सकती।

इस बदलाव का सबसे बड़ा श्रेय 'नियद नेल्लानार' (आपका अच्छा गांव) योजना को दिया जा रहा है, जिसके तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नए सुरक्षा कैंपों के साथ-साथ विकास कार्यों की बौछार की जा रही है। अधिकारियों ने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि अब उन्हें न्याय के लिए किसी जन अदालत के खौफनाक फैसलों का इंतजार नहीं करना होगा, बल्कि 'लोकतंत्र की पंचायत' उनकी हर समस्या का समाधान करेगी। पापाराव जैसे शीर्ष माओवादियों के गांव में प्रशासनिक टीम का पहुंचना नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में एक निर्णायक मनोवैज्ञानिक जीत मानी जा रही है।

इलाके के बुजुर्गों और युवाओं में इस दौरे को लेकर खासा उत्साह देखा गया। प्रशासन ने वहां राशन कार्ड, पेंशन और आयुष्मान कार्ड जैसे दस्तावेज बनाने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है। सुकमा SP ने कहा कि हमारा उद्देश्य केवल इलाके को सुरक्षित करना नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक न्याय और विकास पहुंचाना है। कभी दहशत के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में अब स्कूल की घंटियां और ट्रैक्टरों की आवाज गूंजने की उम्मीद जगी है, जो बस्तर के बदलते स्वरूप की नई इबारत लिख रही है।

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