Raipur: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले 13 वर्षों के दौरान 4,000 से अधिक ऐसे शवों का अंतिम संस्कार किया गया, जिनका कोई वारिस नहीं था। इन लावारिस शवों में से केवल 8 की ही पहचान हो सकी, जबकि शेष हजारों लोग गुमनामी के साये में ही दुनिया से विदा हो गए। पुलिस और नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार, ये शव अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों और सड़क किनारे मिले थे। पहचान न होने की स्थिति में, एक निर्धारित समय सीमा के बाद प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाओं (NGO) के सहयोग से इनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।
हैरानी की बात यह है कि आधुनिक तकनीक, सोशल मीडिया और फिंगरप्रिंट डेटाबेस के इस दौर में भी पहचान की दर इतनी कम है। पहचान न हो पाने के मुख्य कारणों में शवों का क्षत-विक्षत होना, बाहरी राज्यों से आए मजदूरों का होना और परिजनों द्वारा गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज न कराया जाना शामिल है। रायपुर के मरचुरी (शवगृह) में अक्सर क्षमता से अधिक शवों के जमा होने की खबरें आती रही हैं, जिसे लेकर हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी राज्य सरकार को नोटिस जारी कर गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे।
इस नेक काम में रायपुर की कुछ समाजसेवी संस्थाएं और महिला समूह (जैसे 'बुनियाद बेटियां अनमोल फाउंडेशन') महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ये संस्थाएं न केवल लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करती हैं, बल्कि धार्मिक रीति-रिवाजों का भी पालन करती हैं ताकि मृतक को सम्मानजनक विदाई मिल सके। प्रशासन अब डीएनए (DNA) सैंपलिंग और बेहतर डेटा मैनेजमेंट पर जोर दे रहा है, ताकि भविष्य में अगर कोई परिजन अपने खोए हुए व्यक्ति की तलाश में आए, तो उसे कम से कम जानकारी मिल सके।

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