फाल्गुन मास की पूर्णिमा की ठंडी बयार जब हमारे द्वारे पर दस्तक देती है, तो वह अपने साथ सनातन संस्कृति के सबसे जीवंत और रंगीन उत्सव 'होली' के आगमन का संदेश लाती है। इस उत्सव का प्रथम सोपान है होलिका दहन—एक ऐसा अनुष्ठान जो केवल लकड़ी और उपलों को जलाने की परंपरा नहीं है, बल्कि हमारे भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों की आहुति देने का प्रतीक है।
होलिका दहन की कथा हमें भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप के द्वंद्व की याद दिलाती है। यह कथा संदेश देती है कि जब सत्ता और शक्ति का अहंकार (हिरण्यकश्यप) चरम पर होता है, तब अटूट विश्वास (प्रह्लाद) ही उसे चुनौती देता है। आग की लपटों में जलती होलिका इस बात का प्रमाण है कि छल-कपट और बुराई चाहे कितनी भी सुरक्षित क्यों न लगे, सत्य की आंच में उसे भस्म होना ही पड़ता है।
आज के आधुनिक युग में होलिका दहन का महत्व और भी बढ़ गया है। आज हमें बाहरी शत्रुओं से ज्यादा अपने भीतर के 'हिरण्यकश्यप' यानी क्रोध, ईर्ष्या, लालच और नफरत से लड़ने की जरूरत है। हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि उत्सव की खुशी में हम पर्यावरण को क्षति न पहुँचाएँ। सूखी लकड़ियों के स्थान पर गोबर के उपलों का उपयोग और कचरे के सही निपटान से हम इस पर्व को प्रकृति-हितैषी बना सकते हैं।होलिका की अग्नि समाज के भेदभाव, ऊंच-नीच और कटुता को जलाने का माध्यम बननी चाहिए। जब अगले दिन रंगों की फुहार पड़े, तो हर चेहरा प्रेम के एक ही रंग में रंगा नजर आए।
इस वर्ष जब हम होलिका की परिक्रमा करें, तो केवल अन्न और अर्घ्य ही अर्पित न करें, बल्कि अपनी एक बुराई को भी उस अग्नि में त्यागने का संकल्प लें। यह अग्नि हमारे मन के विकारों को शुद्ध कर हमें एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा दे।
आप सभी पाठकों को होलिका दहन की हार्दिक शुभकामनाएँ। यह प्रकाश आपके जीवन के अंधकार को मिटाकर सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करे।
प्रधान संपादक - राकेश तराटे







