Big News : नई दिल्ली- 2025: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों का ब्रेकअप होने पर इसे रेप का मामला नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि रिश्ता खराब होने या ब्रेकअप के बाद पुराने संबंधों को अपराध में बदलना कानून का दुरुपयोग है। यह फैसला उन मामलों पर सीधी मार है जहां बदले की भावना से झूठे आरोप लगाए जाते हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की बेंच ने यह टिप्पणी औरंगाबाद के एक वकील के खिलाफ दर्ज रेप केस को खारिज करते हुए की।
मामला क्या था?
शिकायतकर्ता एक शादीशुदा महिला थी, जिसका चार साल का बच्चा था। वह अपने पति से अलग रह रही थी और मेंटेनेंस केस में आरोपी वकील की मदद ले रही थी। 2022 से दोनों के बीच करीब तीन साल तक सहमति से शारीरिक संबंध चले। महिला ने कई बार आरोपी के गांव में अचानक विजिट भी की। लेकिन जब वकील ने शादी से इनकार किया और महिला की 1.5 लाख रुपये की मांग ठुकराई, तो उसने रेप का केस दर्ज कराया। आरोपी ने कहा कि महिला ने तीन साल तक कभी रेप का आरोप नहीं लगाया।
कोर्ट ने क्या कहा?
सहमति से बने संबंधों को बाद में रेप में बदलना अस्वीकार्य। सहमति का मतलब बाद में बदल नहीं जाता। ब्रेकअप या रिश्ते का खराब होना अपराध नहीं। दो वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंधों को बाद में रेप का रूप देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
शादी का झूठा वादा तभी रेप माना जाएगा जब शुरू से ही इरादा धोखे का हो। यहां ऐसा कोई सबूत नहीं। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से FIR को बरकरार रखने के फैसले को गलत ठहराया और कहा कि FIR पढ़ने से ही सहमति साफ झलकती है।
यह फैसला IPC की धारा 375 (रेप की परिभाषा) और 90 (सहमति की कमी) पर आधारित है। कोर्ट ने 2019 के प्रेमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य केस का हवाला दिया, जहां कहा गया कि सहमति सोच-समझकर ली गई होनी चाहिए।
यह फैसला पुरुषों के अधिकारों की रक्षा करता है और झूठे केसों से न्यायिक बोझ कम करने में मददगार साबित होगा। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसे केस आरोपी की पहचान को नुकसान पहुंचाते हैं और अदालतों पर अनावश्यक भार डालते हैं।








