छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए साल 2026 की शुरुआत एक नई रोशनी के साथ हुई है। देश की आजादी के 75 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद, राज्य के संबलपुर सहित 16 दुर्गम वनग्रामों में पहली बार बिजली पहुंची है। दशकों से लालटेन और ढिबरी की रोशनी में रातें काटने वाले इन गांवों के सैकड़ों परिवारों के घरों में पहली बार बिजली का बल्ब जला, जिसे देख ग्रामीणों की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े।
इन गांवों तक बिजली पहुंचाना प्रशासन के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। घने जंगलों, उबड़-खाबड़ रास्तों और नदी-नालों को पार कर बिजली के खंभे खड़े करना और तार बिछाना एक साहसिक कार्य रहा। वन विभाग और बिजली विभाग के आपसी समन्वय से 'मुख्यमंत्री विद्युत सुलभ योजना' के तहत इस मिशन को पूरा किया गया। अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा कारणों और भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से यहाँ ग्रिड लाइन पहुंचाना मुश्किल था, लेकिन नई तकनीक और इच्छाशक्ति से अब इन 16 गांवों का कोना-कोना रोशन है।
बिजली आने से न केवल घरों का अंधेरा दूर हुआ है, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में भी क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीद जगी है। अब इन गांवों के बच्चे रात में आसानी से पढ़ाई कर सकेंगे और कंप्यूटर जैसी आधुनिक सुविधाओं से जुड़ सकेंगे। ग्रामीणों का कहना है कि बिजली की अनुपलब्धता के कारण वे आधुनिक दुनिया से कटे हुए थे, लेकिन अब वे मोबाइल चार्जिंग, टीवी और पंखों जैसी बुनियादी सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने इस उपलब्धि का जश्न दीप जलाकर और मिठाइयां बांटकर मनाया। संबलपुर के सरपंच ने बताया कि रात के समय जंगली जानवरों का खतरा बना रहता था, लेकिन अब सड़कों और घरों में रोशनी होने से लोग खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इस परियोजना के तहत सरकार ने न केवल घरेलू कनेक्शन दिए हैं, बल्कि खेतों में सिंचाई के लिए भी बिजली पहुंचाने की योजना पर काम शुरू कर दिया है, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी।
छत्तीसगढ़ सरकार का लक्ष्य अब प्रदेश के बचे हुए अन्य दूरस्थ मजरों और टोलों तक भी शत-प्रतिशत बिजली पहुंचाना है। वनग्रामों में बिजली की पहुंच केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का एक सशक्त जरिया है। प्रशासन का कहना है कि बिजली पहुंचने के बाद अब इन क्षेत्रों में सड़कों और पेयजल योजनाओं के काम में भी तेजी लाई जाएगी, जिससे इन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।








