छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु 'वन भैंसा' एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह संरक्षण नहीं बल्कि एक बड़ी प्रशासनिक चूक है। गरियाबंद जिले के उदंती अभयारण्य में पिछले 20 वर्षों से जिस 'नस्ल' को शुद्ध मानकर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, वह डीएनए जांच में हाइब्रिड (मिश्रित) निकली है। इस खुलासे के बाद हड़कंप मच गया है और वन विभाग ने आनन-फानन में इन भैंसों को बाड़े से बाहर खदेड़ दिया है।
मामला तब शुरू हुआ जब विभाग ने अपनी ब्रीडिंग योजना को आगे बढ़ाने के लिए भैंसों का डीएनए टेस्ट (DNA Test) कराया। रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया, क्योंकि इसमें यह बात सामने आई कि जिन भैंसों को शुद्ध वन्य जीव समझकर पाला जा रहा था, उनके पूर्वजों में पालतू भैंसों का अंश मौजूद था। विशेषज्ञों के अनुसार, शुद्ध नस्ल न होने के कारण इनका संरक्षण राजकीय पशु के संरक्षण की श्रेणी में नहीं आता।
पिछले दो दशकों में इन भैंसों के रख-रखाव, सुरक्षा, भोजन और डॉक्टरों की टीम पर करोड़ों रुपये का बजट खर्च किया गया। तत्कालीन अधिकारियों ने बिना किसी ठोस वैज्ञानिक प्रमाण के इन्हें शुद्ध नस्ल घोषित कर दिया था। अब सवाल यह उठ रहा है कि इतने लंबे समय तक बिना जेनेटिक टेस्टिंग के इतना भारी निवेश क्यों किया गया और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
वन विभाग के सूत्रों के अनुसार, हाइब्रिड होने की पुष्टि होने के बाद इन भैंसों को अब खुले जंगल में छोड़ दिया गया है। विभाग का कहना है कि अब केवल उन्हीं भैंसों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जिनकी शुद्धता प्रमाणित है। हालांकि, इस फैसले से उन वन्यप्रेमी और विशेषज्ञों में नाराजगी है जो इसे सरकारी धन की बर्बादी और लापरवाही का बड़ा उदाहरण मान रहे हैं।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ में शुद्ध नस्ल के वन भैंसों की संख्या बहुत कम बची है। इस घटना ने वन्यजीव संरक्षण की प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब विभाग असम और अन्य राज्यों से शुद्ध नस्ल के वन भैंसे लाकर वंश बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है, ताकि राजकीय पशु के अस्तित्व को बचाया जा सके।








