राजनांदगांव: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में खाड़ी युद्ध के वैश्विक हालातों को ध्यान में रखते हुए देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की किफायत करने की अपील की थी। उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया था कि वे ईंधन की बचत के लिए जहां तक संभव हो, सार्वजनिक परिवहन (पब्लिक ट्रांसपोर्ट) सुविधाओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करें। लेकिन जमीनी स्तर पर इस अपील को अमलीजामा पहनाने में भारी व्यावहारिक दिक्कतें आ रही हैं, क्योंकि राजनांदगांव जैसे बड़े शहर में ही आज सार्वजनिक परिवहन सेवा का पूरी तरह से अभाव बना हुआ है।
शहर में करोड़ों रुपये की लागत से खरीदी गईं सिटी बसें आज सड़कों से पूरी तरह नदारद हैं, जिससे स्थानीय जनता को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। दावों और घोषणाओं के बावजूद सड़कों पर नई ई-बसों (इलेक्ट्रिक बसों) का भी दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं है। सार्वजनिक परिवहन का कोई मजबूत विकल्प न होने के कारण मध्यम और निम्न वर्ग के लोगों को न चाहते हुए भी अपने निजी वाहनों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जिससे उनकी जेब पर पेट्रोल-डीजल का अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
प्रशासन और नगर निगम की इस बड़ी लापरवाही के चलते जहां एक तरफ सरकारी संपत्ति कबाड़ में तब्दील हो रही है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण और ईंधन बचत की बड़ी-बड़ी योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आ रही हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब तक शहर में सुचारू रूप से सिटी बसें या ई-बसें नहीं चलाई जाएंगी, तब तक सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने का उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो पाएगा। अब देखना होगा कि इस गंभीर समस्या पर जिम्मेदार अधिकारी कब जागते हैं।








