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बांग्लादेश में हिंदू व्यापारी की दर्दनाक मौत: भीड़ ने चाकू गोदकर पेट्रोल से जलाया, अस्पताल में तोड़ा दम...

International 03 January 2026

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ढाका/शरियतपुर: मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के शासन के दौरान बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। ताज़ा मामले में, शरियतपुर जिले के दामुद्या इलाके में 50 वर्षीय हिंदू व्यवसायी खोकन चंद्र दास की इलाज के दौरान ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मौत हो गई। उन पर बुधवार (31 दिसंबर 2025) की रात कट्टरपंथियों की एक उग्र भीड़ ने उस समय हमला किया था, जब वे अपनी दवा की दुकान बंद कर घर लौट रहे थे।

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घटना के दौरान भीड़ ने पहले खोकन दास को बीच सड़क पर रोका, उन पर धारदार हथियारों से ताबड़तोड़ वार किए और फिर उनके शरीर पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग की लपटों से घिरे खोकन दास ने अपनी जान बचाने के लिए सड़क किनारे स्थित एक तालाब में छलांग लगा दी थी। स्थानीय लोगों ने उन्हें गंभीर हालत में निकाला और अस्पताल पहुँचाया, लेकिन 30-40 प्रतिशत से अधिक जल जाने और गहरे घावों के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका।

मृतक की पत्नी सीमा दास ने मीडिया को बताया कि उनके पति की किसी से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि खोकन ने हमलावरों में से कम से कम दो की पहचान कर ली थी, इसी डर से कट्टरपंथियों ने उन्हें पूरी तरह खत्म करने की कोशिश की। पुलिस ने इस मामले में दो संदिग्धों, रब्बी और सोहाग, के नाम दर्ज किए हैं, लेकिन अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है।

बांग्लादेश में पिछले कुछ हफ्तों के भीतर यह हिंदू समुदाय पर चौथा बड़ा हमला है। इससे पहले 18 दिसंबर को दीपू चंद्र दास की भी ईशनिंदा के झूठे आरोपों में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी और उनके शव को जला दिया गया था। अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता पैदा कर दी है, विशेषकर भारत ने इन घटनाओं की कड़ी निंदा करते हुए बांग्लादेशी अधिकारियों से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।

स्थानीय मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से कट्टरपंथी ताकतें हावी हो गई हैं और हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। खोकन दास की मौत ने पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। पीड़ित परिवार अब न्याय की गुहार लगा रहा है, लेकिन प्रशासन की ढुलमुल कार्रवाई और बढ़ती अराजकता के बीच अल्पसंख्यक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

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