शहर और गांव के बीच के सीमा विवाद और प्रशासनिक ढुलमुल रवैये के कारण लगभग 85 हजार रसोई गैस उपभोक्ता अधर में लटक गए हैं। जिला प्रशासन के दस्तावेजों में ये इलाके शहरी घोषित किए जा चुके हैं, लेकिन गैस एजेंसियां और कंपनियां इन्हें अभी भी ग्रामीण क्षेत्र मानकर चल रही हैं। इस तकनीकी उलझन का सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब और सुविधाओं पर पड़ रहा है, जिससे आम जनता में गहरा रोष व्याप्त है।
शहर-गांव के फेर में फंसी सब्सिडी और सर्विस
शहर और ग्रामीण श्रेणी के बीच फंसे इन उपभोक्ताओं को न तो शहरी क्षेत्र जैसी त्वरित होम डिलीवरी मिल पा रही है और न ही ग्रामीण योजनाओं का स्पष्ट लाभ। कई मामलों में उपभोक्ताओं को रिफिल के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, क्योंकि कंपनियां शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने से कतरा रही हैं। प्रशासनिक रिकॉर्ड अपडेट न होने की वजह से गैस एजेंसियों को भी डिलीवरी चार्ज और अन्य लॉजिस्टिक्स तय करने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
रिकॉर्ड के मिलान में देरी से बढ़ी परेशानी
सूत्रों के अनुसार, नगर निगम और आपूर्ति विभाग के बीच समन्वय की कमी इस संकट की मुख्य जड़ है। शहर का विस्तार तो हो गया और नए वार्ड भी बन गए, लेकिन पेट्रोलियम कंपनियों के पोर्टल पर इन क्षेत्रों का वर्गीकरण आज भी वर्षों पुराना है। जब तक प्रशासन कंपनियों को आधिकारिक पत्राचार के माध्यम से श्रेणी परिवर्तन की सूचना नहीं देता, तब तक कागजों में यह 'अदृश्य सीमा' बनी रहेगी और उपभोक्ताओं को अव्यवस्था की मार झेलनी होगी।
समाधान के इंतजार में हजारों परिवार
वर्तमान में 85 हजार से अधिक परिवार इस असमंजस के कारण परेशान हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे शहरी दरों पर टैक्स चुका रहे हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर उन्हें ग्रामीण बताकर टाल दिया जाता है। उपभोक्ताओं ने मांग की है कि प्रशासन और गैस कंपनियां आपसी तालमेल बिठाकर रिकॉर्ड को तत्काल दुरुस्त करें ताकि उन्हें शहरी क्षेत्र के अनुरूप नियमित और सुगम गैस आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।








