हरिद्वार/ऋषिकेश: आध्यात्मिक गुरु और जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने जीवन में सफलता और मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण सूत्र साझा किए हैं। उनके अनुसार, मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु उसकी अपनी निराशा और स्वयं को छोटा (हीन) मानने की भावना है। ये विचार न केवल मानसिक शांति भंग करते हैं, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक शक्ति को भी धीरे-धीरे समाप्त कर देते हैं।
शक्ति क्षय के मुख्य कारण
स्वामी जी ने स्पष्ट किया है कि हमारी ऊर्जा केवल शारीरिक कार्यों से कम नहीं होती, बल्कि नकारात्मक चिंतन से भी नष्ट होती है:
स्वयं को छोटा मानना: जब हम अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और खुद को कमजोर या अक्षम समझते हैं, तो हम अपनी स्वाभाविक प्रतिभा को दबा देते हैं।
निराशा का भाव: हार मान लेने की प्रवृत्ति मन के उत्साह को मार देती है। एक निराश मन कभी भी सृजनात्मक (Creative) कार्य नहीं कर सकता।
आत्मविश्वास की कमी: खुद पर संदेह करना अपनी क्षमताओं का अपमान करने जैसा है।
शक्ति संचय के लिए स्वामी जी के सूत्र
स्वामी अवधेशानंद जी के अनुसार, इन नकारात्मक भावों से बचने के लिए निम्नलिखित मार्ग अपनाना चाहिए:
सकारात्मक आत्म-संवाद: हमेशा स्वयं से कहें कि आप ईश्वरीय अंश हैं और आपके भीतर असीम संभावनाएं छिपी हैं।
पुरुषार्थ और धैर्य: सफलता तुरंत नहीं मिलती, लेकिन निरंतर प्रयास और धैर्य से निराशा के बादल छंट जाते हैं।
वर्तमान में जीना: भविष्य की चिंता और अतीत के पछतावे से मुक्त होकर वर्तमान क्षण में पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए।
संत वाणी का सार
स्वामी जी का संदेश स्पष्ट है: "अपनी गरिमा को पहचानें।" जब आप स्वयं का सम्मान करना शुरू करते हैं, तो संसार भी आपका सम्मान करता है। निराशा एक अंधकार है, जिसे केवल 'आत्म-विश्वास' के दीपक से ही दूर किया जा सकता है।







