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Bastar Education News: नक्सल प्रभावित इलाकों में फिर गूंजी स्कूलों की घंटी, शिक्षा की लौ से बदल रही नई पीढ़ी की तस्वीर

Chhattisgarh 04 September 2026

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रायपुर, 4 सितंबर 2026: छत्तीसगढ़ के पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लंबे इंतजार के बाद शिक्षा की नई सुबह दिखाई दे रही है। बस्तर और आसपास के दूरस्थ इलाकों में कभी जहां हिंसा और भय का माहौल था, वहां अब बच्चों की आवाज, प्रार्थना और राष्ट्रगान सुनाई दे रहे हैं। वर्षों से बंद पड़े स्कूलों के दोबारा शुरू होने को सिर्फ शिक्षा की वापसी नहीं, बल्कि शांति, सुरक्षा और विकास की नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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5 सितंबर को देशभर में शिक्षक दिवस मनाया जाएगा। इस अवसर पर बस्तर के दूरस्थ इलाकों में शिक्षा व्यवस्था की वापसी उन शिक्षकों के समर्पण की कहानी भी सामने लाती है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का काम जारी रखा। कई गांवों में वर्षों बाद स्कूल की घंटी बजना ग्रामीणों के लिए भावुक और उम्मीद भरा अनुभव बन गया है।

वर्षों से बंद स्कूलों में फिर शुरू हुई पढ़ाई

राज्य सरकार की पुनर्वास, सुरक्षा और जनकल्याण से जुड़ी पहलों के बीच दक्षिण बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को दोबारा मजबूत किया जा रहा है। बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे जिलों में लंबे समय से बंद पड़े 600 से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को दोबारा संचालित किए जाने की जानकारी सामने आई है।

कई स्थानों पर स्कूल भवनों को नुकसान पहुंचा था या उनका उपयोग अन्य कार्यों के लिए किया जा रहा था। प्रशासन और सुरक्षा बलों के सहयोग से ऐसे भवनों को फिर से तैयार कर बच्चों के अनुकूल वातावरण बनाया गया है। इससे दूरस्थ गांवों के बच्चों को अपने ही क्षेत्र में पढ़ाई का अवसर मिलने लगा है।

स्थानीय शिक्षकों ने संभाली शिक्षा की जिम्मेदारी

इन इलाकों में शिक्षा की वापसी में स्थानीय शिक्षकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और लंबे समय तक बने रहे भय के माहौल के बावजूद शिक्षकों ने बच्चों और उनके परिवारों से लगातार संपर्क बनाए रखा।

स्थानीय भाषा और बोली में संवाद करने से बच्चों का स्कूल के प्रति विश्वास बढ़ाने में मदद मिली है। गोंडी, हल्बी और डोरली जैसी स्थानीय बोलियों के माध्यम से बच्चों से संवाद कर शिक्षक उन्हें पढ़ाई से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

शिक्षकों ने अभिभावकों से भी संपर्क कर उन्हें बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। इससे कई ऐसे बच्चे दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं, जिनकी पढ़ाई लंबे समय से बाधित थी।

कहीं पक्की इमारत नहीं तो अस्थायी छप्पर में पढ़ाई

बीजापुर और सुकमा के कई अंदरूनी क्षेत्रों में स्कूलों को दोबारा शुरू करने के लिए स्थानीय समुदाय ने भी महत्वपूर्ण सहयोग दिया है। जिन स्थानों पर स्कूल भवन क्षतिग्रस्त हो चुके थे, वहां ग्रामीणों ने प्रशासन के साथ मिलकर अस्थायी बांस और तिरपाल के ढांचे तैयार किए, ताकि बच्चों की पढ़ाई बंद न हो।

स्थानीय शिक्षित युवाओं को शिक्षा दूत के रूप में जोड़ने से भाषा और संवाद की समस्या को कम करने में मदद मिल रही है। ये युवा बच्चों के साथ स्थानीय भाषा में संवाद करते हुए उन्हें स्कूल के वातावरण से परिचित कराने और पढ़ाई के प्रति रुचि विकसित करने में भूमिका निभा रहे हैं।

स्मार्ट क्लास और डिजिटल साधनों से जुड़ रहा बचपन

दोबारा संचालित स्कूलों में शिक्षा को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। कई वनांचल स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल सामग्री और टैबलेट जैसे संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

पढ़ाई के साथ बच्चों के लिए खेल सामग्री और भोजन की व्यवस्था भी की जा रही है। इससे स्कूलों का वातावरण अधिक आकर्षक बनाने और विद्यार्थियों की उपस्थिति बढ़ाने में मदद मिल रही है।

सुरक्षा के साथ लौट रहा भरोसा

दूरस्थ क्षेत्रों में स्कूलों के दोबारा संचालन के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करना भी महत्वपूर्ण रहा है। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने से शिक्षकों के लिए नियमित रूप से स्कूल पहुंचना आसान हुआ है। इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा और अभिभावकों के भरोसे पर भी दिखाई दे रहा है।

जहां कभी हिंसा के कारण बच्चों की शिक्षा बाधित हुई थी, वहीं अब वही क्षेत्र स्कूल, किताब और शिक्षा की गतिविधियों से जुड़ रहे हैं। यह बदलाव ग्रामीण समाज में नई उम्मीद पैदा कर रहा है।

स्कूल की घंटी बनी शांति और बदलाव की पहचान

इस शिक्षक दिवस पर बस्तर के दूरस्थ इलाकों में काम कर रहे शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से सामाजिक बदलाव के वाहक के रूप में सामने आ रहे हैं।

स्कूलों में लौटती बच्चों की चहल-पहल यह संदेश देती है कि शिक्षा किसी भी क्षेत्र के विकास की मजबूत नींव है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में फिर सुनाई दे रही स्कूल की घंटी बच्चों के बेहतर भविष्य के साथ-साथ शांति, विश्वास और विकास की नई कहानी भी लिख रही है।

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