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Raipur Culture News: ‘रंग तरंग’ के अंतिम दिन लोक वाद्ययंत्रों की थाप पर जीवंत हुई छत्तीसगढ़ी संस्कृति

रायपुर, 3 सितंबर 2026। पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र मांदरी और ढोलक की थाप के साथ ‘रंग तरंग’ कार्यक्रम के तीसरे और अंतिम दिवस का शुभारंभ हुआ। कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियों और लोक वाद्यों की मधुर धुनों ने पूरे परिसर को छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और परंपराओं के रंग में रंग दिया।

लोक वाद्यों की ताल पर कलाकारों ने बांधा समां
कार्यक्रम में कलाकारों ने मांदरी और ढोलक की पारंपरिक ताल पर विभिन्न लोक प्रस्तुतियां दीं। लय, ताल और संगीत के अनूठे मेल ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कलाकारों की प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने तालियों के साथ उनका उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम के माध्यम से छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक कला और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत झलक देखने को मिली।
नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी
कार्यक्रम में संस्कृति संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि लोक वाद्ययंत्र और पारंपरिक लोक कलाएं छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन परंपराओं का संरक्षण कर उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि ‘रंग तरंग’ जैसे आयोजन कलाकारों को मंच देने के साथ लोक परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अलग-अलग जिलों के कलाकारों ने दी प्रस्तुति
‘रंग तरंग’ के अंतिम दिवस पर विभिन्न जिलों से आए कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। रायपुर के वायलिन वादक डॉ. के. रोहन नायडू, अंबिकापुर के तबला वादक नासिर खान, बालोद के पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र कलाकार संजू कुमार सेन और गरियाबंद के लोक वाद्ययंत्र कलाकार प्रेम यादव ने प्रस्तुतियां दीं। उनकी कला को दर्शकों की खूब सराहना मिली।
लोक संस्कृति के संरक्षण का संदेश
‘रंग तरंग’ के जरिए छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं, संगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों को मंच देने का प्रयास किया गया। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी समाजसेवी उदयभान, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान सहित अन्य गणमान्य अतिथि मौजूद रहे।
कार्यक्रम में शामिल लोगों ने लोक कलाकारों का उत्साह बढ़ाते हुए पारंपरिक कला और विलुप्त हो रहे लोक वाद्ययंत्रों के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजनों को जरूरी बताया। कार्यक्रम ने नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और लोक परंपराओं से जोड़ने का संदेश भी दिया।






