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पैरामेडिकल कोर्सेज में भी NEET? CM स्टालिन ने PM मोदी को पत्र लिख कर जताया कड़ा विरोध...

National RRT News Desk 26 January 2026

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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने एक बार फिर केंद्र सरकार की शिक्षा नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इस बार विवाद की जड़ पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों (जैसे नर्सिंग, फार्मेसी और फिजियोथेरेपी) में प्रवेश के लिए NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) को अनिवार्य बनाने का फैसला है। सीएम स्टालिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक औपचारिक पत्र लिखकर इस निर्णय को वापस लेने की पुरजोर मांग की है।

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ग्रामीण छात्रों के भविष्य पर संकट

मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में तर्क दिया है कि पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश परीक्षा लागू करने से ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि के छात्रों पर अत्यधिक बोझ पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अधिकांश पैरामेडिकल छात्र सामान्य परिवारों से आते हैं और वे महंगी कोचिंग और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की तैयारी करने में सक्षम नहीं होते। स्टालिन के अनुसार, यह फैसला शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के खिलाफ है।

राज्यों के अधिकारों का हनन

स्टालिन ने इस मुद्दे को संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से भी जोड़ा है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विषयों पर राज्यों को अपनी स्थानीय जरूरतों के हिसाब से निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। केंद्र द्वारा एक समान परीक्षा थोपना राज्यों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप है। तमिलनाडु सरकार का मानना है कि कक्षा 12वीं के अंकों के आधार पर ही इन कोर्सेज में प्रवेश दिया जाना सबसे उचित और निष्पक्ष तरीका है।

NEET की विश्वसनीयता पर सवाल

अपने पत्र में सीएम स्टालिन ने हाल के वर्षों में NEET परीक्षा के आयोजन में हुई कथित अनियमितताओं और पेपर लीक जैसी घटनाओं का भी जिक्र किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुख्य चिकित्सा पाठ्यक्रमों (MBBS/BDS) की परीक्षा प्रणाली ही संदेह के घेरे में है, तो इसे पैरामेडिकल जैसे अन्य क्षेत्रों में विस्तारित करना छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा होगा।

पुरानी व्यवस्था बहाल करने की मांग

अंत में, तमिलनाडु सरकार ने मांग की है कि पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश की पुरानी व्यवस्था को बहाल रखा जाए, जहां राज्य बोर्ड की परीक्षाओं के प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाती है। मुख्यमंत्री ने पीएम मोदी से आग्रह किया है कि वे इस संवेदनशील मामले में हस्तक्षेप करें और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश दें कि वे इस नए नियम को लागू न करें, ताकि छात्रों के हितों की रक्षा की जा सके।

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