नई दिल्ली: भारत सरकार ने आर्थिक प्रगति को मापने के तरीके में बड़ा बदलाव करने का निर्णय लिया है। अब देश की प्रगति को केवल GDP (सकल घरेलू उत्पाद) के आधार पर न मापकर NDP (निवल घरेलू उत्पाद) के आधार पर देखा जाएगा। यह कदम अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति और दीर्घकालिक विकास को बेहतर समझने के उद्देश्य से उठाया गया है।
सरकार के अधिकारियों ने बताया कि GDP जहां देश में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य बताता है, वहीं NDP में उत्पादन से मशीनों, उपकरणों और अन्य पूंजीगत संसाधनों के मूल्यह्रास (depreciation) को घटा दिया जाता है। इससे देश की वास्तविक उपज और बचत का सटीक आंकलन होता है और यह दिखाता है कि कितनी वास्तविक वृद्धि हुई है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि NDP आधारित माप सामाजिक और पर्यावरणीय स्थिरता को भी अधिक ध्यान में रखता है। वही GDP में कुल उत्पादन को आधार मानते हुए यह नहीं देखा जाता कि उत्पादन के दौरान संसाधनों की कितनी कमी हुई या पूंजीगत संसाधनों को कितना नुकसान उठाना पड़ा।
सरकार इस बदलाव को लागू करने के लिए अगले कुछ वर्षों में आवश्यक तैयारियाँ कर रही है। योजना है कि यह नई प्रणाली धीरे-धीरे लागू की जाएगी और इसे 2029-30 के वित्तीय वर्ष से मुख्य आर्थिक संकेतक के रूप में अपनाया जाएगा। फिलहाल GDP जारी करना बंद नहीं किया जाएगा, बल्कि NDP के आंकड़ों को अधिक महत्व दिया जाएगा।
आधुनिक आर्थिक मानकों के अनुसार, कई विकसित देशों में भी NDP को विकास का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। भारत में इस बदलाव को देश की आर्थिक गुणवत्ता, दीर्घकालिक स्थिरता और वास्तविक लाभ का अधिक सही आकलन माना जा रहा है।
सरकार का यह भी कहना है कि NDP आधारित आंकड़े नीति-निर्माताओं को दीर्घकालिक निवेश, संसाधन प्रबंधन और सतत विकास के मुद्दों पर बेहतर निर्णय लेने में मदद करेंगे। इससे आर्थिक योजनाएँ और नीतियाँ और भी प्रभावी रूप से तैयार की जा सकेंगी।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इससे आर्थिक विकास की तस्वीर अधिक स्थिर और साफ़ दिखाई देगी, क्योंकि यह उत्पादन मात्र से आगे बढ़कर असली आय और बचत को दर्शाएगा।








