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लाल गलियारे का हृदय स्थल - क्यों और कैसे बना बस्तर माओवादियों का 'मुख्यालय'?


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दशकों पहले जिस सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी, उसने अपनी सबसे मजबूत जड़ें छत्तीसगढ़ के बस्तर में जमाईं। आज बस्तर केवल एक जिला या संभाग नहीं, बल्कि माओवादियों की 'पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी' (PLGA) का रणनीतिक मुख्यालय बन चुका है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जो आंदोलन कभी अविभाजित आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) में चरम पर था, वह सात समंदर पार की तरह बस्तर की दुर्गम पहाड़ियों में कैसे सिमट गया?

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तेलंगाना का 'ग्रेहाउंड्स' मॉडल और पलायन

1980 और 90 के दशक में उत्तरी तेलंगाना (तब आंध्र प्रदेश) माओवादियों का मुख्य गढ़ था। हालांकि, आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा गठित 'ग्रेहाउंड्स' (Greyhounds) बल के आक्रामक ऑपरेशनों ने माओवादियों की कमर तोड़ दी।

नेतृत्व का सफाया: तेलंगाना में माओवादियों के शीर्ष कैडर या तो मारे गए या उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मजबूर होना पड़ा।

इंटेलिजेंस नेटवर्क: स्थानीय मुखबिरों के मजबूत तंत्र ने माओवादियों के लिए तेलंगाना के गांवों में छिपना असंभव बना दिया।

विकल्प की तलाश: अपनी अस्तित्व की रक्षा के लिए माओवादियों को एक ऐसे क्षेत्र की तलाश थी जहाँ आधुनिक पुलिस बल आसानी से न पहुँच सके। बस्तर इस पैमाने पर पूरी तरह खरा उतरा।

बस्तर: भौगोलिक वरदान या अभिशाप?

बस्तर का अबूझमाड़ (Abujhmad) क्षेत्र लगभग 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैला एक ऐसा इलाका है, जिसका आज भी पूरी तरह से सरकारी सर्वे नहीं हो पाया है। माओवादियों के लिए यह "स्वर्ग" साबित हुआ:

दुर्गम पहाड़ियां और घने जंगल: यहाँ की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि सुरक्षा बल अपनी भारी मशीनरी और वाहनों के साथ प्रवेश नहीं कर पाते।

ट्राइजंक्शन का लाभ: बस्तर की सीमाएं महाराष्ट्र, तेलंगाना और ओडिशा से मिलती हैं। सुरक्षा बलों के दबाव बनाने पर माओवादी आसानी से राज्य की सीमा लांघ जाते हैं, जिसका लाभ उन्हें अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) की उलझनों के कारण मिलता है।

प्रशासनिक शून्यता और आदिवासियों का असंतोष

बस्तर के मुख्यालय बनने के पीछे केवल जंगल नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुपस्थिति भी एक बड़ा कारण रही।

विकास की कमी: दशकों तक बस्तर के अंदरूनी इलाकों में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुँचीं। इस 'वैक्यूम' को माओवादियों ने अपनी 'जन अदालत' और समानांतर सरकार (जनता सरकार) से भरा।

जल-जंगल-जमीन का मुद्दा: खनिजों से भरपूर इस क्षेत्र में औद्योगिकीकरण और विस्थापन के डर ने आदिवासियों को सुरक्षा के लिए माओवादियों की ओर धकेल दिया। माओवादियों ने खुद को आदिवासियों के रक्षक के रूप में पेश किया।

रणनीतिक बदलाव: बस्तर बना 'बेस कैंप'

जब 2004 में 'पीपुल्स वार ग्रुप' (PWG) और 'माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर' (MCC) का विलय होकर CPI (Maoist) बना, तब बस्तर को उनकी सैन्य रणनीति के केंद्र में रखा गया।

कारक तेलंगाना (पुरानी स्थिति) बस्तर (वर्तमान स्थिति)

पुलिस कार्रवाई उच्च (ग्रेहाउंड्स द्वारा) मध्यम से उच्च (अब सुधार जारी)

जनता का समर्थन विकास के कारण कम हुआ अलगाव के कारण बना रहा

शीर्ष नेतृत्व अधिकांश नेता यहीं के हैं नेतृत्व

वर्तमान चुनौतियां और सरकार का रुख

पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने 'ऑपरेशन प्रहार' और 'सुरक्षा कैंपों' की स्थापना के माध्यम से माओवादियों के कोर क्षेत्रों में सेंध लगाई है। सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है और 'विश्वास-विकास-सुरक्षा' की त्रिवेणी पर काम हो रहा है। हालांकि, माओवादियों द्वारा लगाए गए IED और उनका स्थानीय सूचना तंत्र अभी भी बड़ी चुनौती है।

7. निष्कर्ष

बस्तर का माओवादी मुख्यालय बनना एक ऐतिहासिक और रणनीतिक विवशता का परिणाम था। तेलंगाना से खदेड़े जाने के बाद, बस्तर की दुर्गम वादियों ने उन्हें वह सुरक्षा कवच प्रदान किया जो उन्हें कहीं और नहीं मिल सकता था। आज जब विकास की किरणें अबूझमाड़ के जंगलों तक पहुँच रही हैं, तो यह संघर्ष अपने अंतिम और सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।

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